जो खुश दिखता है
जरूरी नहीं,
कि वह खुश हो ही ;
खुशी ओढ़ी भी तो जा सकती है !
ठीक वैसे ही
जैसे अपने देश के
करोड़ों भूखे , नंगे लोग
पेट की आग बुझाने की असफल कोशिश में
जिंदगी की चक्की में
पिसे जा रहें हैं
फिर भी
{ खुशी से ?}
जिए जा रहे हैं !
अभाव और दुःखो के
गहन अंधकार में
सुख और साधनों की
एक क्षीण- सी लौ का भी सहारा नहीं है
उनके जीवन में
फिर भी;
करोड़ों पथराई ऑंखों में
ऑंसुओं को बेदखल करते हुए
न जाने कौन से
सुनहरे भविष्य के सपने तैर रहे हैं
जिन्हें पाने की मृग-मरीचिका में
वे घिसटते हुए दौड़ रहे हैं
सिसकते हुए हॅंस रहे हैं
और मरते हुए जी रहे हैं |
जवानी में ही झुर्रियों भरे
असंख्य दयनीय चेहरों पर
चिपकी हुई बेजान मुस्कुराहटें देखकर
मेरा यह विश्वास लगातार गहराता जा रहा है
कि जो खुश दिखता है
जरूरी नहीं ,
कि वह खुश हो ही ;
खुशी ओढ़ी भी तो जा सकती है !
--उत्तरी शकुन नगर,
फतेहपुर - उ0प्र0
दूरभाष- 9336453835